प्रकाशक $ साहित्य भवन लिमिटेड, प्रयाग

द्वितीय संस्करण मूल्य २)

सुद्रक गिरिजाप्रसाद श्रीवास्तव, हिन्दी साहित्य प्रेस, प्रयाग

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पॉडत अमरनाथ का

पूज्य गुरुदेव १० अम रनाथ स्तरों, एस्‌० ए०, डी० लिट्‌० वाइस चांसलर, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी | की सेवा सें सादर समर्पित

अपनी बात

हिंदी नाटक-साहित्य के इतिहास मे प्रसाद? जी सर्वप्रथम मोलिक ओर प्रसिद्ध नाटककार हैं, यह बात सवत्र मान्य है। आधुनिक नाटक- कारो मे उनका स्थान सी सर्वोच्च है। उनके नाठकों से प्राचीन ओर आधुनिक नाव्यशेलियों का अत्यन्त सुन्दर सम्मिश्रण तो मिलता ही है, साथ ही उनका एक आदश है जिसने उनकी रचनाओं को एक. अपूर्व रूप दे दिया है। इस आदर्श के उपयुक्त उपकरणों का भी उनकी रचनाओं से असाव नही है। प्रस्तुत पुस्तक सें सुयोग्य लेखक ने अजातशत्र्‌ ?, स्कन्दगुतः और “चन्द्रगुत नामक तीन ऐतिहासिक नाटकों को लेकर “प्रसाद? जी की नास्य-कला ओर उनके नाठकों का कथा-संगठन चरित्र-चित्रण, अंतहन्द्र, आदश आदि ख़ुख्य-मुख्य बातों पर सरल ओर सुन्दर ढ'ग से विचार किया है| साहित्यिकों तथा विद्या- थियों के लिए. यह एक उचम और उपयोगी रचना है। अतः इसका नवीन संस्करण हिंदी पाठको के सामने रखते हुए हमे हर हो रहा है |

पुरुषोत्तसदास टंडल, संन्नी, साहित्य सदन ल्लि०, प्रयाग (

दो शुदद

यह पुस्तक कई वर्ष पूर्व ही प्रारम हो चुकी थी परन्तु अनेक कारणों में अब समाप्त हो सकी है | श्री प्रसाठ जी के ऊपर इधर कुछ वर्षों में ही अच्छा साहित्य प्रकाशित हो चुका है परन्तु उनके नाठकों का सम्यक विवेचन अभी तक देखने मे नहीं आया। सिलीसु वी की ध्यताद की नाख्यक्रत्ा? बहुत पहले प्रकाशित हो चुकी थी। उसके बाद भी प्रतादजी की नाटक रचना जारी रही | शिलोसु बजी ने मुख्यतः अजातशत्र तक्र प्रकाशित नाठकों के आधार पर ही प्रभाद की कला का विवेचन किया है | इसलिए बाद मे प्रकाशित दो महत्वयूण नाठकों की आलोचना उनकी पुस्तक में नहीं सकी है। प्रस्तुत युस्तक का उद्देश्य शिलीमुखती के का को आगे बढ़ाता ही है। दो शब्द पुस्तक के नामकरण पर निवेदन करना आवश्यक है पुस्तक का नाम “प्रमाद के तीन ऐतिहासिक नाटक? रखा गया है यद्यपि इससे इन नाटकों की आलोचना की अपेज्ञा लेखक का उद्देश्य प्रसाद की नास्यकला का अध्ययन अधिक रहा है। स्थानाभाव के कारण प्रसाद के केबल तीन नाठकों और उनमे आये हुए मुख्य चरित्रों का ही विवेचन हों सका है, परन्तु इस सीमित क्षेत्र मे भी प्रसाद की नाव्यकला के सर्मी अंगो का पूर्ण अव्ययन प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया गद्य है ) पुस्तक लिखने मे मुझे जिन लेखकों की पुस्तकों से सहायता प्राप्त हुई है उनका में सदेव आमारी रहूँगा उन लेखकों के नाम उनकी पुस्तकों से लिए गये उद्वरणो के साथ ही दे दिये गये हैँ | अपने वाल- मित्र श्री हतुमानप्रसाद तिवारी जी का मुझे बडा सहयोग मिला है परन्तु आत्मीयता की दृष्टि से उन्हें धन्यवाद देना ठीक नही मालूम

( ३२ )

होता यद्यपि कभी-कभी आधी रात तक ठंड में बैठकर इस पुस्तक की पाइलिपि सशोधन मे जब्र उन्हे अघक देर हो जाती थी तब मुझे उनके ऊपर दया भी झ्राती थी ओर श्री पूज्य भामीजी के क्रोध का स्मरण भी हो आता था | अपने दूसरे मित्र श्री राजेन्रसिंह गौड़ ओर श्री मानिकलाल जी को भी में इस समय नहीं मूल सकता जिन्होंने इस पुस्तक के लिखने के लिए पेरित किया था और जिनकी स्वाभाविक सुहृदयता से मुझे समय-समय पर बड़ा उत्साह मिलता रहा | अन्त से डाक्टर रामकुमार जी वर्मा का भी जिन्होंने अपना

बहुमूल्य सभय देकर इस पुस्तक की भूमिका लिखने का कष्ट किया है, मे सब से अधिक ऋणी हूँ।

_ इंख है कि पूर्ण सावधानी रखते हुए भरी पुस्तक में प्रेस की कई भूलें रह गई हैं। आशा है पाठकगगु साया की इस जुटियों की ओर ध्यान दंगे |

इस पुस्तक द्वारा यदि मै साहित्व की कुछ भी सेवा कर रुका तो अपने परिश्रम को सफल समझूँगा।

दर

ऋाइस्ट चर्च कालज, )

कानपुर, (

>. राजश्त्रर प्रसाद अर्ग॑त्त २० अप्ेल,? ४४ हे

सूमिका

साहित्य किसी सी राष्ट्र की ऐसी साधना है जिसमें उसे आत्माभि- व्यक्ति के साथ ही साथ आत्मोन्नति की प्ररणाएं प्राप्त शोती हैँ।यह आत्मोन्नति केवल उसकी अंतरंग भावनाश्रों होती है प्रत्युत उसके चारों ओर जो राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियाँ होती हैं, उनसे भी बह यथोचित स्फूति प्राप्त करता है | इस प्रकार साहित्य के विकास में परिस्थितियों का भी बहुत बड़ा हाथ रहा करता है। साहित्य और समाज एक-दूसरे को प्रभावित करते हुए अपने दृष्टि-बिन्दु निर्धारित करते चलते हैं।

हिन्दी साहित्य अपने निर्माण और विकास मे परिस्थितियों से विशेष प्रभावित हुआ है | चारणकाल, भक्तिकाल, कलाकाल और आधुनिक काल में जो विशेष विचार-घाराश्ं की प्रगति चली है, वह साहित्य की विविध शैलियों की जननी है। यद्रत्रि इतिहास का विभाजन विशिष्ट कालों मे होकर अपने विकास की परिस्थितियों होना चाहिए तथाप्रि किसी भी काल की प्रमुख विचार-धाराएँ उपेज्षा की दृष्टि से नही देखी जा सकतीं | सामाजिक ओर राजनीतिक परिस्थितियाँ साहित्य के विकास में ऐसी ही निर्माण सीमाएँ हैं जैधी किसी नाटक से सचियाँ हुआ करती हैं

हिन्दी साहित्य के विकास पर इष्टि डालते समय ये परिस्थितियाँ महत्त्वपूर्ण हैं! आधुनिककाल जो मारतेन्दु के युग से प्रारंभ होता है, विचार धाराश्रों के तीत्र घाव ओर प्रतिघात से अपने निर्माण में विशेष सजग हुआ है| पश्चिम का संपक उसे अपने नवीन रूप के निर्धारण में विशेष सहायक हुआ है। पश्चिम में साहित्य ने जीवन की जिस इहृष्टिकोण से आलोचना की है, वह दृष्यिकोश हिन्दी के सामने भी आया और उसके यथाथवाद ने हिन्दी साहित्य को विविध विचार-

( )

क्षेत्रों अपना विकास करने के लिए प्रोत्साहित क्रिया। भारतीय विद्रोह, बग-भंग, महायुद्ध और असहयोग आन्दोलन आधुनिक साहित्य को अग्रमर करने से सहायक हुए हैं और उनसे उन्हे स्फूति भी प्राप्त हुई है | इसी समय हिन्दी साहित्य को पश्चिम के इृष्टकोण से अपना विकास करते हुए. भारतीयता के प्रति स्वाभिमान मी प्राप्त हुआ है उसने नाटक, उपन्यास, कविता और कहानी में सास्कृतिक इतिहास की टष्ठभूसि पर अपने आधुनिक सवपों से भाग लिया है ओर अपने भविष्य-निर्माण का पथ प्रस्तुत किया है। साहित्य ने राष्ट्रीय भावनाओं के साथ ही साथ अन्त ट्टरीय सहानुभूति भी ऋपनायी और ऐसी दृष्टि प्राम की जो भौगोलिक और ऐतिहासिक सीमाओं से नहीं रोकी जा सकी |

सास्कृतिक ओर अन्तर्राष्ट्रीय विचारों को साहित्य से प्रत्रिष्ठ कराने वाले साहित्य-निर्माताओ में श्री जयशंकर प्रसाद? की प्रतिमा से बंतोन्मुखी रहो है। नाटक, कविता, उपन्यास, कहानी और निबन्धों मे उन्होंने भारतीयता का अभिन्नान जिस कलात्मक ढ'ग॒ से प्रस्तुत किया है. वह हिन्दी साहित्य में अद्वितीय है। उनके नाटक तो इस दृष्टि से अ्रत्यन्त महत्वपूर्ण हे। ऐतिहासिक प्रृष्ठभूमि पर उन्होंने भारतीय मनोविज्ञान को जिस स्पष्ठता के साथ अक्रित किया है वह केबल हिन्दी की अमर इझति है वरन््‌ वह भारतीय इतिहास नधिनी है। नाठक है जिन

'ओर साहित्य की अमूल्य अजातशत्र , स्कन्दगुत और चन्द्रगुत्त उनके ऐसे तीन 0302: किसी भी साहित्व को गर्व हो सकता है। उनके व्यापक दृष्ठिक्ोण के तीन उदाइरण लीजिए :--

ध्प्ज्प्र श्र वज्ध-करे हृठ्य रे रे हूँ तीत *% वज्र-कठोर हृठय पर जो कुटिल रेखा-चित्र खिंच गये हैं, पी कसी मिठ्ये ? बढ़ि आप

35 का की इच्छा है तो वर्तमान मे कुछ रमणीय 577 वित्र छोजिये, जो भविष्य से उज्ज्यल होकर दशकों के हृदय को की सुखी बनाकर सुख पाने का अम्यास कीजिये [०

[ अजातशत्रु पृष्ठ ११३ |

(६

ध्युद्ध क्या गान नहीं है ! रुद्ध का गीनाद, मैरवी का ताएडब- नहत्य ओर शर्खों का वाद्र मिलकर भेरव संगीत की सृष्टि होती है नीवन के अन्तिम दृश्य को जानते हुए, अपनी आँखों से देखना, जीवन- रेहस्थ के चरम सौंदर्य की नम और भयानक वास्तविकता का अनुभव केवल सच्छे बीर हृदय को होता है | ध्वंसमयी महासाया प्रकृति का यह निरंतर संगीत है। उसे सुनने के लिए हृदय मे साहस और बल एकत्र करो। अत्याचार के श्मशान से भी मंगल का--शिव का, सत्य सुंदर संगीत का समारंम दह्वोता है ।?? हे [ स्कन्दगुम, पृष्ठ ४५ ] “समभढारी आने पर यौवन चला जाता है--जब तक माला गूँथी जाती हे तब तक फूल क्ुम्हला जाते है जिससे मिलने के सम्भार की इतनी धूमधाम, सजावट, वनावट होती है, उसके आने तक मनुष्य दय को सुन्दर और उपयुक्त नहीं बनाए रह सकता मनुष्य की चंचल स्थिति तब तक उसे उस श्यामल कोमल हृदय को मर्भूमि बना देती है| यद्दी तो विपमता हैं ।2 [ चन्द्रगुप्त, पृष्ठ १३०-१३१ ] प्रसाद के इस व्यापक दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से समझने की आव- श्यकता है। प्रसाद जैसे कलाकार का अध्ययन आ्रधुनिक आलोचना का विषय होना चाहिये | उससे साहित्य के विद्यार्थियों को अपने जीवन के आदर्श प्राम होगे | अभी तक प्रसाद के नाटकों की आलोचनाएँ और उनके दृष्यिकोण को पहिचानने के प्रयास कम हुए हैं | डा० जगन्नाथ प्रसाद तिवारी और शिलीमुख जी की कृतियाँ इस ज्षेत्र मे प्रशंसनीय | प्रस्तुत पुस्तक भी इस दिशा में एक सफल प्रयत्ष है। श्री अ्र्गल जी हिन्दी के सफन समालोचक हैं और उन्होने सास्कृतिक और ऐतवि- हातिक पृष्ठभूमि पर प्रसाद के नाटकों का विशेष अध्ययन क्रिया है वे साहित्य में सासकृतिक ओर राजनीतिक परिस्थितियों का महत्त्व जानते है और इसी कारण वे प्रसाद की नाव्यकला ओर भाव-क्षेत्र की विवेचना-

कर,

बड़े सुन्दर ढंग से कर सके हैं। प्रसाद के नाटकों का यह अध्ययन सामाजिक ओर राजनीतिक पृष्ठभूमि पर पूर्णतया नवीन और मोलिक है। स्थानाभाव के कारण उन्होंने प्रसाद के तीन प्रमुख नायक ही चुने हैं

श्री अगल जी संगीतज्ञ, चित्रकार और काव्य-प्रेमी भी हैं| इन तीनों की समष्टि से वे प्रसाद जी की सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक पात्रों की सावा- त्मक सृष्टि पूण रूप से समझने में सफल हुए हैं। देवसेना के चरित्र की दिव्य अनुभूति मुझे अ्र्गल जी की समीक्षा में पूर्ण सन्तोषजनक मिली | देवसेना के जीवन की संगीत-प्रियता में क्रीड़ा करता हुआ प्रेम ओर आत्मोत्सर्ग अर्गंल जी की आलोचना से सष्ट हुआ है। इसी प्रकार स्कन्दगुप्त ओर चाणक्य की चरित्र-रेखा भी स्पष्ट हो गई है |

यह पुस्तक हिन्दी के विद्वान्‌ ओर विद्यार्थियों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करेगी यह मेरा विश्वास और सन्तोष है।

हिन्दी विभाग,

अयाग विश्वविद्यालय? प्रयाग २०-४-४४

रामकुमार वर्मा

विषय-सूची

प्रसाद को नाव्य-्कला भारतीय नाठक प्रसाद से पूव ओर पश्चिम /“* ' प्रसाद की नास्य-कला के मूलतत्व कथोपकथन संगीत अजातशत्र_ दाशतिक प्रष्ठभूमि कथा-संगटठन चरित्र-चित्रण अजातशत्रु विम्बसार स्कन्द्गुप्त कथा-संगठन चरित्र-चित्रण स्कन्दगुप्त देवसेना भसटाक पन्द्रगुप् रचना-तिथि कथा-संगठन चरित्र-चित्रण चन्द्रगुप्त चाणक्य डप्संहार

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प्रसाद की नाव्य-कला भारतीय नांठक

नाटकों का जन्म अनुकरण प्रशन॒त्ति ही नाख्य साहित्य की जननी है | अ्रतएव नाटक

जिक्र

के सभी उपकरण हमारी मानव वृत्तियों में ही अन्तर्निहित हैं। उनके लिए तो हमें समाज की और संस्कृति की आवश्यकता है परन्तु साहित्य सुव्यवस्थित समाज में ही विकसित हो सकता है ; अ्रतएव नाख्य साहित्य का प्रादुर्भाव सभ्यता के विकास केसाथ ही साथ हश्रा। आदिम निवासियों की अनुकर प्रवृत्तियों ने धार्मिक उत्सवों पर देवता की पूजा को अविक प्रभावशाली शिक्षा-पूर्ण और मनोरजक बनाने के लिए उनकी स्तुतियों को एक प्रकार की रासलीला अथवा राम- लीला में परिवर्तित कर दिया, जिनमें उन देवी-देवताओं के जीवन की अटनाओं का अभिनय एक या दो पात्रों द्वारा किया जाता था। इन अमिनयों में संगीत की प्रचुर मात्रा थी ; क्योंकि वास्तव में ये देवी- देवताओं की प्राथनाएँ ही थीं | क्रमशः संगीत की सात्रा कम ह्ाती गई और बोल-चाज़ की भाषा का प्रयोग इन पूजाओं में होने लगा |

रे] [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक नाटक

सस्कृति के विकास के साथ ही साथ इन अभिनयो में साहित्य की पुट भी दी जाने लगी

भारतवर्ष के नाव्य साहित्य दा उद्भव काल ऐतिहासिक हुष्ठ- भूमि के परे अंधकार से जिपा हुआ है | वह किस समय विकसित हुआ यह ठीक रूप से नहीं कहा जा सकता | प्रारंभ में इसको रूपरेखा क्या थी, यह केवल कल्पना से ही या अन्य देशों के नवजात नाट्य साहित्य के अव्ययन से ही जाना जा सकता है। यूनान और चीन के नाट्य साहित्य का जन्मकाल, उनकी शैशवावस्था तथा किशोरावस्था के विषय में हमारे पास प्रचुर सामग्री है अतएव यूनान और चीन के साहित्यिक आधार पर ही हम मारत के प्रारंभिक नाख्य साहित्य की कल्पना कर सकते हैं।

बहुत पहले यूदान देश मे डायोनिसस देवता की पूजा करने के लिए लोगो ने अजा-गीतों की रचना की थी डायोनिसस हमारे यहाँ के गणेश जी के समान अद्ट मानव और अद्ध पशु थे | अन्तर केवल इतना ही था कि उनका मुँह मानवी था और देह अजा की | इसी कारण अजा-गीत गाते सम्य, गायक बकरी का चमड़ा अपने ऊपर ओढ लिया करते थे | अजा-गीत वास्तव मे प्राथना ही थी और गाने के रूप से एक-दो पात्रों द्वारा कही जाती थी धीरे-धीरे ये गीत परि- वतित होकर ट्रेजडी या दुःखान्त नाठकों के नाम से प्रसिद्ध हो गये। सुखान्त नाटकों का भी प्रादुर्भाव इसी रूप मे हुआ था। होली जैसे अश्लाल उत्सवों पर लोग गाड़ियों में बैठकर अश्लील गीत गाते थे ओर रारते चलते तमाशबीनों पर व्यंग कसते जाते थे। यही अश्लील गीत धीरे-धीरे परिष्कृत होकर सुखान्त नाटकों के रूप मे गये

सत्कृत नाटको का इतिहास

,._ नाटक्रीय उद्भव दे; इसी आघार पर हम कह सकते है कि हमारे चयहां वदिक-काल ही नाटक रचना होने लगी थी ; परन्तु उसके

श्र्ता दा 9०% द्उ ्ल्ल्ज धर्ताद की साव्य-कला ] [६

बास्तविक राप का हनस एता सही | महाभारत और रासायण॒-काज मे हमे दो एक साटकों के नाम मिलते ह: परन्तु उन नाटकों की प्रतियाँ श्री तक प्राप्त नहीं हुई नाटकों का ऐतिहालिक जान हमे व्याकरणाचार्यो ; से मिलता है | पाणिना के कथानुतार उनके बहुत पहले ही भारतवप मे नास्य साहित्य पर लक्षण ग्रन्थ आदि बन चुके थे | अतः -सिद्ध है कि व्याकरण-काल तक यहाँ पर नाटकों का इतना

प्रचार हा गया था कि लोगों ने उनक विपय मे नियमादि बनाना प्रारभ कर दिया था | पाशिनी का समय लगसंग ३०० ई० 7१० माना जाता है, इसलिए भारतवप में ईसा के कई शवाब्दी पूव से ही नाठक रचना होने लगी थी। कालिदास का समय जो पहले नाटकों का बालकाल समझा जाता था, वारतव मे नाठको के विकास का सध्य युग था। यत्रपि यह सत्य है कि कालिदास ेे पृ के नाटकों का ज्ञान होने से नास्य॑ साहित्य का अव्ययन कालिदास के ही समय से प्रारम होता है |

कालिदास ने मालविकास्निमित्र, विक्रमोबंशी तथा शक्ुन्तला तीन बहुत ही उत्तम और विश्वविख्यात नावक लिखे | शकुन्तला तो कवि की अमरऊकृति है जो कई भापाशों से अनूदित भी हो चुकी हैं। कालिदास के उपरान्त श्री हप ने नागानद ओर रत्ावली नावक लिखे तथा श्री शद्धक ने मच्छुकटिक नामी एक सुन्दर और सर्वा गपूर्ण नाटक लिखा | इनके परचात्‌ ८बी शताब्दी मे महाराज वशोवर्धन के राज- कवि भवमभूति ने नावकशास्त्रों के नियमो मे विशद्ता और संशोधन-सा करते हुए अपने कई उत्तम नाटक लिखे जिनमें उत्तर रामचरित, महा- वीर-चरित ओर मालती-माधव विशेष प्रसिद्द हैं। इन्होंने अपने नाटकों मे नाठ्कीय सिद्धान्तो का उल्लघन भी यथेष्ट किया | परन्तु कवि की प्रतिभा ने कहीं भी इनकी कला को नीरस या शक्तिहीन नहीं बनाया |

€वीं शताब्दी मे भट्ट ने ऑर विशाखदत्त ने सुद्राराक्षस नाठक लिखे इनके उपरान्त राजेश्वर ने वालरामायण और कपू रमजरी की रचना की |

$ ] [ असाद के तीन ऐतिहासिक नाक

इस समय भारत पर यबनों के आक्रमण होने लगे थे और धीरे-धीरे हष का विस्तृत साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया | आपसी बैमनस्य ने भारतवप्र को छोटे-छोटे राज्यों मे विभक्त कर दिया | दवंप और प्रतिहिसा के कारण हिन्दू राजा एक दूसरे के शत्रु बन गये | हिन्दू साम्राज्य का यह अवसान- काल था जिसके साथ ही साथ भारतीय सस्क्ृति, भार्तीय कला ओर भारतीय साहित्य भी नष्ट हो रहा था | सस्कृत नाटकों का जो जाज्वल्य- सान मध्यात हमे कालिदास के समय में मिलता है, उसकी अस्त होती हुई रूप-रेखा हमे बालरामाथण और कपू रमंजरी मे समझना चाहिए | थवन आक्रमणो के कारण सस्‍्कृत साहित्य अधकार के गत में विलीन हो गया और यद्यपि यत्र-तत्र कुछ सस्कृत साहित्यिको ने अपने धंधले प्रकाश से नाख्य साहित्य को आलोकित करने का प्रयत्न किया था, परन्तु उनमे रवि का तेज था | उनकी मलिन ज्योति भिल- मिलाते हुए ताराओशों और नक्तत्रों का ही प्रकाश था। मुसलमानी आक्रमणो के पश्चात्‌ सस्कृत साहित्य फिर से गौरबान्बित हो सका

हिन्दी साहित्य मे नाटक

११वी शताब्दी हिन्दी का विकास-काल था और उस काल के कवियों ने इसी नई भापा को अपनी क्ृतियों मे अपनाया | स्स्क्कत उनके लिए मत भाषा हो चुकी थी | श्रतएव इस काल मे संरकृृत नास्य साहित्य की रचना समाप्त हो गई | मुगलो के शासन काल मे साहित्य के इस भग की उन्नति हो सकी, क्योकि एक तो समय और परिस्थितियाँ का प्रतिकूल थी और दूसरे मुगल सस्कृति और घर्म में नाट्य साहित्य के प्रति पेम होने के कारण नाटकों को राजकीय प्रोत्साहन हि हल मिला | कभी-कभी हिन्दू महाराजाओं के यहाँ रामलीला या पतर्मीला-सडली अपने खेल-तमाशे किया करती थीं; लेकिन इनमे आमिक प्रदत्ति ही अधिक थी, साहित्यिक रुचि कम | अतः हिन्दी

से जहाँ काः जा हा कविता इतनी उन्नति कर गई, जहाँ उसका निजी साहित्य

असाद की नाव्य-कला | [९

काफी हो गया वहाँ एक या दो साधारण नाटकों को छोड़ कर नास्य साहित्य की रचना श्ध्वी शताब्दी तक प्रारम्भ हो सकी |

हिन्दी में नाटक रचना भारतेन्दु-काल से ही प्रारभ होती है। कहा जाता है कि हिन्दी का सवध्रथम नाटक नहुप भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी के पिता श्री गोपालचन्द्र जी ने ब्रजभापा मे लिखा। इसके अनन्तर राजा लक्ष्नणसिंह जी ने वोलचाल की भाषा में कालिदास के शक्कुन्तला नाटक का अनुवाद उपस्थित किया | परन्तु नाटक खिखने की सच्ची प्रेरणा भारतेन्दु के ही हृदय में हुई ओर इन्होंने साहित्य के इस अंग की यथाशक्ति सेवा की | कुल छोटे-बड़े सव मिलाकर ३० नाटक इन्होने लिखे | जिनमे से कुछ तो न्यूनाधिक रूप मे सस्क्ृत नाठकों के अनुवाद हुए, कुछ छातानुवाद या उन पर सभारित हैं | इनके कुछ नाटक मौलिक भी हैं, लेकिन इनकी सब से बद्दी मोलिकता खडी-बोली' के प्रयोग मे थी और (इस प्रकार हिन्दी नाटकों का जन्म हुआ |)

हिन्दी नाटकों का जन्म अनुवाद ओर समानुवाद में होना कोई आश्वय तनक नही है | क्योंकि प्रायः ८०० वर्षों के पश्चात्‌ नाटकीय सिद्वान्‍्ती और उपकरणों को जनता और लेखकों के सामने विलकुल मौलिक रूप मे उपस्थित करना अभश्रृेंमव ही था। इस कारण नवीन उत्साह उत्तन्न करने के लिए अनुवादों ओर छावासुबादों की सब से बची आवश्यकता रहती है। भारतेन्द्र जी ने नास्यशासत्र के नियम- उपनियमों पर भी कुछ प्रकाश डालने का प्रयन्न किया था ओर साथ ही साथ इन्होने बेंगला ओर भअेंग्रजी नाव्यशासत्रा का उतबाग भी अपनी कृत्यों मं किया था; लेकिन इनका अधिक झुकाव ससस्‍्कृत नाट्यशासत्र की अं ही रह | इसी काल मे देहली के श्रीनवासदास जी ने रण॒घीर- पग्रममोहनी नाटक लिखा जो विस्तार के कारण र/“मच के योग्य ने था। उसका शिष्ट हास्य ही नाटक का गाश है। प० बद्रानारायण कृत भारत-सौमारय में भी यही दोप गया है। नाटक काफी लम्बा है ओर ६० पात्रों का अमिनय में भाग लेना नाय्कीय दृष्टि से एक

2 द्रीस पति गरऋू लाइक ६] [ अलाद के तीन ऐसिहालिक चाट

जि

कठिन समस्या दे | इसी समय प० शालक्ृपर सह, लाला सीताराम जी ओर राधाकृष्णदास जी ने भी कुछ साठक लिखे लेकित इससे; राथा- कृष्णठास जी का महाराणा प्रवायः ही सर्वाध खुत्दर है आर देह सफलता से अभमिनीत सी हो चुका अनुवाद की पद्रात ता पहल से चली आा सहा था ते कत ट्रिवरदा-

पु

युग की अनूदित ऋृतियाँ बहुत ही सुन्दर ओर भावए्ण #| | लाहा सीताराम जी ने सस्क्ृत के नाठको का अनुवाद किया तिनम सागनद मसच्छुकटिक, महावीर-चरित, मालती-माथब ओर उन्तरनमचास्त बहुत ही सकल अनुवाद हुए हैं| सागा सरल ओर प्रदाहयुक्त है | मूल के भावों के फेर पड़कर अनुवादक ने साण का क्लिष्ट आड़ अथरहीन नहीं बनाया है श्री सन्‍्वनारायण जी ने मालती-माधव आऋरि उत्तर-यमचरित का अनुवाद किया | कविताओं का अनुशद पदित जी ने बड़ी भावपूर्ण अजभापा में किया है, लेकिन मूल के भावों कछो यथा- शक्ति अनुवादित करने में इनकी भापा कई जगह क्लिप्ट हो गई हे | श्री रामकृष्ण वर्मा, गोपालराम गहसरी और रूपनाराबण पाडे जी ने दिजेद्ल्‍रलाल राय ओर गिरीशचन्द्र घो० के नाठकों के अनुवाद हिन्दी में प्रस्तृत किये इन अनुवादों से पांडे जी का दुर्शाढास बहुत ही सुख्दर है | अन्य भाषाओं से भी अनुराद होना प्रारंभ हुआ जिनमे महाराष्ट्र भाषा के छुत्रसाल नाटक का विशेष आदर हुआ | अश्ी तक साहित्यिक नाटक हिन्दी मे नहीं लिखे गये थे, लेकिन जनता की रुचि नाठकों की ओर काफी बढ चली थी | पारसी साठक कंपनियों के नाटक हिन्दी ओर उठ को खिचद्ा रहा करते जनम उदय झार गद्य का विचित्र सम्मेलन होता था। गद्य में बलते-बोलते पात्र का पद्म का आज्रय लेना स्वाभाविक समझा जाता था | ढेश, काल आर पात्रा का थी विचार रखा जाता था | वास्तविकता और स्वाभाविकता की और ध्यान देना दर्शकों की करतत्नब्वनि के सामने अधिक प्रशसनीय था | और यह करतलब्वनि, शेरबाज़ी में प्रत्यक्

प्रसांद की नाव््य-कला | [

2 है

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शर के बाद मिल लाया करती थी। ऐसे रंगमंच और जनता से तो सचि ही परिप्कृत हो सकती थीं और स्ाहठित्यिकों का प्रयत्न छी सफल हो सकता था | पारसी कंपनियों के लेखकों मे पं० ह्रीकृप्ण जाहर ही पहले लेखक थे जिन्होंने महाभारत नामक नाटक कलकत्ता की पारसी ऋम्पर्नी द्वारा खिलाकर भारतीय विष्यों की ओर इन कम्पनियों का ध्यान आकपित फिया। पं० राशेश्याम कथावाचक जी भी इर्न्दी श्री एयॉ के नाट्ककारों में से हैं इनके एक दो नाटक कुछ जत् अय्य भी

प्रसाद जी हिन्दी साहित्य के सवप्रथम मौलिक नाटककार हुए। इन्होने एक ओर तो प्राचीनता का ध्यान रखा, दसरी श्र अंग्रेजी आर वबेगला साहित्य से प्रभावित होकर नवीन माग ग्रहण किया | इस तरह इनकी नाव्यशैली प्राचीन और अर्वाचीन नाव्यशैनी की सम्मे- लनमृमि है | एक ओर तो आप पूर्ण आधुनिक ही हैं श्रोर दूसरी ओर नितांत प्राचीव | उन्नीसवीं शताब्दी के'अन्तिम चतुर्थांश मे जन्म लेने ओर बीसवीं शत्ताब्दी मे कला-विकास होने के कारण उनकी रचनाओं ओर चरित्र भे १६ वीं ओर २० वीं दोनों शताब्दियों के उपकरण दिखाई देते हे

“उन्नीरुवीं शताब्दी ने उन्हे रोमांस के प्रति कुकाव, मस्ती, बविलासितापूण सरसता और मंसदों से यवारूस्मव अलग रख कर सासान्य सुख के साथ जीवन बिताने के भाव प्रदान किये और

ग्रीसवीं शताब्दी थे उन्हें योवन का अवाह, परिवत्तनोन्मुखी प्रवृत्ति,

भारतीयता की आर झछुक्राव, विदृग्धता तथा अ्रस्थिर बेदना का

दान दिया ?!*

नाटकों के अन्तर प्रवाह भें इस वारतविकता और आदश का नूठा मिलन है | जिसने प्रसाद के नाटकों को एक मौलिक रूप दे

से

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रफे |

गये

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१सुमन जी--- कवि अछाद की काब्य-साथना 7?

८] [ भ्साद के तीन ऐतिहासिक नांटक

दिया है | इनकी नाव्यशैत्ी पूव और परिचिम से प्रभावित अवश्य है परन्तु उसमे मोलिकता भी है | के [इन प्रसाद में पूव और पश्चिम

आधुनिक नाटकों से पश्चिमी प्रभाव

आधुनिक हिन्दी नाव्य रचनाओं पर मुख्यतः बंगाची, अगरेज़ी ओर सस्क्षत नाव्यशासत्रों का ही प्रभाव पढ़ा है | इसके अभी तक कोई भी मौलिक सिद्धान्त नही। हिन्दी नाटक की यह शैशवावस्था ही है। अतृ्ब यह स्वाभाविक ही है कि वह दूसरों के सहारे चलने का प्रयत्न

दिया

कई कही कही कुछ नाठककारों ने अपनी प्रतिमा के बल पर अपनी मोलिकता रखने का प्रयत्ञ किया है; परन्तु ऐसे उदाहरण कम ही हैं जहाँ पर उनकी मौलिकता अधिक सफल हो सकी हों। मुख्यतः अगरेज़ी नाठको का ही प्रभाव आधुनिक नाटककारों पर अधिक है क्योकि आधुनिक शिक्षा मे ओगरेज़ी का स्थान प्रमुख होने के कारण सभी लोग उसके साहित्य से भिन्न हैं | दूसरे, बगाली साहित्य जो बहुत अंशो में अगरेज़ी नाटकीय सिद्धान्तो से प्रभावित हैं, भारतेन्डु काल से ही हिन्दी लेखकों को अपनी ओर खींचने लगा था | इस प्रक्नर हिन्दी नाटकों पर बगाली साहित्य के द्वारा अंग्रेज़ी साहित्य का अप्रत्यक्ष प्रभाव बहुत दिनों से रहा है | यहाँ एक वात स्मरणीय है कि यूनानी तथा अर्वाचान श्रेगरेज़ी नास्थ-सिद्धान्त भारतीय्‌ नास्वशाला के अच्षु- ऊल नहीं हैं | इसलिए अगरेज़ी के एलिजावेथ कालीन नाटककारो का हो प्रभाव हिन्दी अश्चक देखने को मिलता है शेक्सपियर और उसके समकालीन नाटककार अपने नाटकीयु आदशों और सिद्धान्तों सम सस्क्ृत नात्यशाब्र के अधिक समीप हे उनका वाटयावरण भारतीय सस्क्कत नाडकों के रोमान्टिक वातावरण के समान ही रहा है यही कारण है कि इब्सन, शा और गेल्सवर्दी आदि का प्रभाव राय तथा अन्य बंगाली नाठककारों मे कम दी दिखाई देता है | हिन्दी में इब्सन

जा

प्रसाद की नाव्य-कला | [६

के नाटकों के अनुवादों को छोड़ कर अभी तक कोई भी ऐसी कृति नही जो अंग्रेऩी साहित्य के आधुनिक मनोवेगो से भरी हुई हो [.हाँ एकाकी नाटकों की बहुलता अवश्य ही आधुनिक पश्चिमीय एकाकी नाटकों के कारण है ओर सामाजिक समस्याओ्रो, कथासंगठन, भापा प्रभाव नही के बराबर है | यत्र-तत्र कुछ प्रयन् भी इस ओर किये गए. हैं, परन्तु वे अधिक सफच नहीं कहे जा सकते

असाद जी की नास्य-रचना बगाल के द्विजेन्रलाल राय के नाटको:

से अधिक प्रभावित है और राय बाबू के नाटक स्वयं ही पश्चिमी

प्रभावों से ओत-प्रोत हैं। अतएव प्रसाद जी की रचनाओं में पश्चिमी नाव्य-सिद्धान्तों के उपकरणों का होना स्वाभाविक ही है [साथ ही अपनी रुचि और संस्कृति के कारण प्रसाद जी सब से अधिक भारतीय भी हैं, इसलिए प्रसाद जी की नासख्य-कला एक रूप से पूव और पश्चिम नाव्यशासत्रों की सम्मेलन-मभूमि है. जिसको उन्होंने अपनी

प्रतिमा के बल पर बहुत कुछ नया रूप दे डाला हे |

संनकृत नाटको मे कारुणय

संस्कृत नाटकों का निर्माण धामिक नीब पर ही हुआ है धर्म के मिद्वान्त ही नाटक के उपकरणो विखरे हुए थे। अ्रव्यात्मवाद में

ओोतप्रांत राष्ट्र के लिए यह स्वाभाविक ही था क्रि उसका साहित्य भी

अध्यात्मवाद का ही एक रूप हो | अतएवं गीता में बतलाये हुए.

अनाश्रितः क्सफतल' का। कम करोति यः

सन्‍्यासी योगी निरप्िनचाक्रियः

रा नि

जायते म्रिपते कद्ाचन ..... हन्यते हन्यमाने शरीरे कर्स की प्रधानता और आत्मा की नित्यता मे विश्वास सस्कृत साहित्य के प्रत्येक अंग पर अपना अस्तित्व जमाये हुए है | हमारा जीवन हमारे

३० | [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक नाटक

पूवकर्मों का फल है यदि हम सुखी हैं तो यह सुख्व हमारे पुए्यकर्मो का पुरस्कार है आर दुःख हमारे नीच कमा का दश्ड | ईश्वर ही हमारे कर्मो की परख करता है | नित्य अच्छे कर्म करने पर आत्सा नित्यप्रति उर्नात करता हुई मांज्न पाकर आवागमन के बन्धनां से छट जाती है जब तक आत्मा से पूर्ण शुद्बता नहीं तब तक लिवाण उसके लिए सम्भव नही | भिन्न-भिन्न रूप, भिन्न-भिन्न जीव उसी एक सचा के रूप हैं - सव से हमारा यही आत्मा विद्यमान है। पुण्यकर्स करने पर आत्मा एक शरीर छोड़ अच्छे शरीर को घारण करती है। आत्मा परमात्मा का ही अ्रश हे, वह नित्व है अमर है। करे की प्रधानता ओर आत्मा की नित्यता से विश्वास करने के कारण संस्कृत नाथ्का- चार्यो' के सिद्धान्त यूनानी नाटकाचायों से भिन्न हो गये | संस्कृत नाटकों से यूनानी नाटकों के समान दुखान्त नाथ्क नहीं है; क्योंकि यहां पर झत्यु इतनी आंधक दुखदायी नहीं जितनी पश्चिस मे | झुत्यु हाना केवल आत्मा का एक वस्त्र त्याग कर दसरा वस्र धारण करना ही तो है | जब्र तक चोरासी लाख योनियों का चक्र जीवात्मा पूरा करती तब तक उसे मोक्ष कहाँ ? मृत्यु हमे हमारे अन्तिम उद्ृश्य का ओर ही तो ले जाती है--वह तो केवल नये जीवन का सन्देश ही है फिर झृत्यु से दुख क्‍यों ? यही कारण है जिससे संस्कृत नाथ्कों से हमे यूनानी जैसे दारुण हुखान्त नाटक हा मलते | आपात्तया का सामना करना प्रत्येक महान्‌ पुष्प का कत्तव्य है | वहीं तो सोने की परख बताती है, “कष्ट हृदय की करूोटी हे तपस्या अप्लि हे?--देवसेना | इस कारण जो जितनी आपदाओं का सामना करेगा उसका आत्मा उतनी ही अधिक प्यसान होगी। आपत्तियाँ डव के नही, सुख के क्षण हैं| उनसे द.ख देखना अपनी आत्मा के सीति अपराध करता है। आपदाएँ मोक्ष का उुगम पथ हें, हमारी परीक्षा _। उत्तम साधन | दूसरे हमारे इस जीवन का दःख हमार पूर्वजन्स 5 कसा का फल है जिसे हम भोगना ही पड़ेगा। वह हमारे दष्कसो

प्रसाद की क्ताज्य-फकला ] [ 4५

का परिणाम है, आत्मा की सचिनता घोने के लिए हम कष्ट सहने है| होगे | शक्रुल्तला की आपत्तियाँ उसके आीिवि-सत्कार मे मूल होने के फलल्वरूप थीं। देदी सीता की कव्णावस्था उनके पूवजन्म की भूल का दगद् थी। इसी कारण ही इन देवियों की करण गाथा इस रा के हदव को अधिक से हिला सकी | फिर भी यूत्यु आर आपत्तियाँ ससार की कठोर समस्याएँ हैं | अतः संस्कृत नावकाचाज ने सृत्यु का रगशाला पर दिखाना वर्जित कर द्विवा है: क्योकि उनके आडर्शानुसार साहित्य का उद्देश्य सुख और शान्ति का संदेश देते हुए जीवन का आदश स्थापित करना है। इस कारण मी र२रक्षन में रुखात्त नाइकी की रचना नहीं हुई। करुण-रस नाटकों में अवश्य रहता था लेकिन उसमे वह तीत्रता रहता थी जो शेक््सपिवर की ट्रेजडिया मे हम मिलती है। प्रसाद जी के तीनों .. एविद्ासिक नाटक करूणु रस से परिपूण है। और यद्यपि चन्द्रगुप्त का अन्तिम अक सुस्बान्त है, परन्तु रकनद और अजातशत्र से सुख और सफलता के सागर में करुणु रस की हिलोर ही उठती दिखाई ढेती हँ। स्कलदगुस के अन्तिम दृश्य से जो करुणता व्याप्त है, वह वराग्य का भाव हमारे हृठव में उत्पन्न कर ठेती है। वेव्ना ओर स्कनन्‍्द का त्थाग, उनके जीवन में आये हुए घोर नराश्य के फलस्वरूप ही तो है | हृदय की कामल कल्पना सो जा, जीवन सें जिसकी। सम्भावना नहीं। जिसे द्वार पर आये हुए लोटा दिया था। उसके छ्िए घुकार सचाता कया तेरे लिए कोई अच्छी बाद हे 4 )

जे ;

ग्राज़् जीवन के भावी सुख, आशा ओर आकांक्षा--सब से मे

विद्या लेती हूँ ।"** 7 2

परन्तु यह कारुणय शेक्रसपियर के अन्तिम दृश्यों मे फ्रितना भिन्न है-._ूसम शोक नहीं, दुस्ब नही, हृदय को हिला देने वाली करुण॒ कथा 'नही--क्वल जीवन का महान आदेश रखते हुए शान्ति म॑ उसकी समाप्ति है। छदय इस लॉक 7 गौड़ अन्य लोक जा पहुँखता है |

35,

लमक

4० हे

4 टअन+++

3३ ] [ प्रसाद के तीन एंतिहासिक नाटक - स्कन्दगुप्त की ये अन्तिम पक्तियाँ किसके हृदय में त्याग का भाव उत्पन्न कर देगी

“क्रप्ट हुदय की कसौटी है। तपस्या अप्नि है। सम्राट यदि इतना भी कर सके तो क्‍या ! सब च्ञणिक सु्खों का अन्त है। जिससे सुर्खो का अन्त हो इसलिए सुख करना ही चाहिए ।/ मेरे इस जीवन के देवता ! और डस जीवन के प्राप्य क्षमा 7? इतिहास की दृष्टि से महाराज विंवसार की मृत्यु अन्तिम दृश्य में आवश्यक थी, परन्तु मरणान्त होते हुए भी अजा-शत्र सुखान्त नाठक

रहा है | हृदय की उत्कट वासनाओं का अन्त शा/न्त्र में हता है। विरुद्धक, श्यामा, मागन्ची, छुलना और अज्ञात अपने अपने चित्त के विकारों को छोड़कर सत्पयथ पर आते हैं | यद्यपि जिंवसार का अन्तिम अंक से लड़खडा कर गिरना उसकी मृत्यु का द्योतक हे, परन्तु यह दृश्य सुख और शान्ति का ही दृश्य है। महाराज जिंबसार की मृत्यु “ओह , इतना खुख से एक साथ सहन कर सकंगा”? कहते हुए ही होती है साथ ही भगवान्‌ गौनम का प्रवेश आर उनका अमर हाथ उठाना विंवसार के हृदय की तथा उस अवसर की पूण शान्ति का सूचक है। अजातशत्र्‌ का कथानक कुछ अंशों से शेक्सप्रियर के रिचई_ द्वितीय ओर किंग लियर से मिलता है। परन्तु प्रसाद जी का नाटक शेक्सपियर

के लाटक से बिलकुल ही भिन्न है। अजातशत्र नाटक शेक्सपियर के हार्था मे फिग लिपर के समाव भयानक टे जडी हती

जावन का महान आउश' उपात्थत करने के लिए तथा नाटकों

हारा जनता सुब शाति का सन्देश देने के लिए सस्कृत नाठकों ने बट नियम बना रखा था कि नाखकों के नायक सव॒लोक प्र द्ध हों तथा

उनक्कथानक हमारे घामिक अथवा ऐतिहामिक रावात्रीं वा देवताओं के

सनार

ग्रथां से हा लिये जाव | जीवन साधारण-जनममूह के लिर वेसे ही गक रहा करते हैं। साथ हो ऐसे चरित्र दर्शकों के हृदय मे अपने आप हा उुस्य के प्रतत प्रीति और पाप के प्रति घृणा उत्पन्न करा सकते

'असाद को नाव्य-कला | [ १३

हैं। पाप का पतन दिखाने के लिए या नायकों के चरित्रों के आ्रादशों को अधिक दीतमान करने के लिए. खल-नायकों (५॥]]०॥॥) के पूर्य विकसित चरित्र भी रखे जाते थे; लेकिन पश्चिमी दृष्टि से यहाँ पर कोई (00॥08 ७५(0७ होता था जहाँ कि पापी अपने दष्कर्मा का परिशान भागे आर पुण्यात्मा विजयी हों। पापी की सबसे बड़ी यंत्रणा उसकी मनोवेदना है--उसकी आत्मा की भत्सना है अतएव भौतिक वा शारीरिक कष्ट दिखला कर, साथ हो नायकों का महान आदर्श उपरिथत करने के लिए प्रत्येक पापी नायक द्वारा क्षमा कर दिया जाता था| इस प्रकार इस चरित्रो, के द्वारा तथा उनकी जीवन-घट- नाओ के द्वारा नाटक एक आदश वातावरण काही चित्र मालूम होता था। भठाक की भत्सता ओर स्कन्द, चाणक्य अथवा बिंवसार का ज्ञमा-दान इसी रूप मे ही

कम का आदश सस्कृत नास्यकारों के सम्मुख सदा ही रहता था और इस दृष्टि से त्याग और सेवा नायक के सबसे बड़े गुण थे | चाणुक्थ सचमुच में कूटनीति का निर्माता था और उसका कौटिल्य नाम उसके चरित्र का ही ब्ोतक है | लेकिन उस ब्राह्मण ने जो कुछ किया दूसरों के लिए--स्वय के लिए नहीं | इसी कारण बह मुद्राराक्षस का नायक हो सका | चन्द्रगुम का चाणक्य भी कर्म के इसी आदर्श की सावना है |

“सोयर्य तुम्द्वारा पुत्र आर्थ्यावर्स का सम्राट है। अब और कौन सा सुख छुम देखना चाहते हो ? कापायथ अहण कर लो जिसमे अपने अभिमान को मारने का तुम्हे श्रवसर मिलेणा ॥?? हक अं हज “कितना गौरवसय श्राज का अरुणोद्य है भगवान्‌ सविता तम्हारा आलोक जगत्‌ का मंगल करे। में आज जेसे निष्काम्त हो हाह 07?

चक्रवर्ती सम्नाट भी अपना काय करते हुए अन्त में तपोभूमि की

नयर ही जाते है | इस उद्देश्य के कारण सस्क्ृत नाठको के अ्रन्तिम

]

१४ ] [ असाद के तीन एतिहासिक नाटक

दृश्य चाह करुण रस से ओंतप्रोत हो या उनसे सुख का समीर बहता हो, सदैव एक अनुपम शान्ति लिये हुए रहते हैँ | जो शान्ति इस ससार के वातावरण से भिन्न हमे दूसरे वातावरण की ओर ले 'जाती है | प्रसाद जी के सभी नाटकों का अन्त इसी शान्ति में होता हैं। उनमे एक प्रकार का वैराग्य भाव मालूम होता हे | “यदि मे सन्नाट होकर किसी विनन्न लता के कोमल किंसलय झुरसुट से एक अधघखित्ा फूल होता और ससार की दृष्टि सुझ पर पडती, पवन की किसी लहर को सुरभित करके धीरे से डस थाले से चू एडता, तो इतना भीषण चीत्कार इस विश्व से सचता ।?--अजातशज्न रा रा नर स्कन्दगुतत और चन्द्रगुत नाटक के अन्तिम दृश्यों के उदाहरण हम ऊपर उद्बृत कर ही चुके हैं। आदश वातावरण चित्रित करने की दृष्टि से संस्कृत नाथकों मे नित्यप्रति की बातों का प्रदर्शन वर्जित था कठु सत्वता ओर भौतिक- वाद रणमंच पर दिखाना आचायों' के सिद्धान्त के प्रतिकूल था, क्योकि ऐसे दृश्य आदश लोक के निर्माण मे वाधक रहते हैं| इसी कारश भरतमुनि ने लम्बी यात्रा, हत्त्या, युद्ध, राजबिद्रोह, खाना-पीना, कपड़े व्य पि 3 2. दि का दिखलाना निषेध कर दिया था। प्रसाद जी ने “3 नियम के विरुद्ध जो दृश्य रखे है, वे केवल पश्चिमीय नागको के भाव के कारण ही ४४७४७

हे

) रह 2 +

सस्कत नाटका मे प्रकृति वर्णन

. डत नाटकों के धामिक सस्कारों के कारण ही उनका प्रकृति वणुन अतिरज्जित हो उठा है| आत्मा केवल मनुष्य से ही नही है| परमात्मा विश्वात्मा है। झतएव क्या फल-फूल, क्या पशु-पत्ञी सब से “हादर का संबंध, सभी एक दूसरे के दुःख से दुखी और एक दूसरे के

प्रसाद की नाव्य-कला | [ १५

सख से सुखी होते है सीता ओर हा ऊन्तला का वियोग उन्हीं तक सीमित ने था | उसमे प्रकृति की भी प्रण सहा नुभूति थी | पू् प्रकृति उस विप्दात्मा का प्रतिव्मि हा ता हे | रहस्थवादी_ कवि सी झात्मा

शा +५

की नित्यता और जीब का एकता मे विश्वास करता है, ओर प्रथम

रहस्ववादो कब्र होने के कारण भी प्रमाद जा इस प्रभाव से अछूते ही कच ने | वब्पि संसार के क्रिसी भी देश के नाटकों में रहरबवाद नहीं पाया जाता लेडिन प्रसाद जी के सहह्यबार का प्रभाव उनके नाटकों पर थोडा बहुत अवश्य है | डेवमेना प्रञ्मति देवि की ही संम्य मृर्ति है उसका संगीत और फूलों से लद॒ हुए पारिजात का संगीत एक हो दे

“तम्ने एकानत टीले पर, लब से अलग, शरद के सुन्दर प्रभात में फूला हुआ, फूल से लबा हथ्ा पारिजात दक्ष देखा हे!

“हीं ता

“उसका स्वर अन्य दुक्षों से नहीं मिलता वह अकेले अपने सौरभ की तान से दक्षिण पवन से कटा डत्पन्न॒ करता है, कलियों को चटका कर, ताली वजाकर ऋम-कूस कर नाचता हैं। अपना नृत्य, अपना संगीत वह स्वय देखता है; सुनता है डसके अन्तर मं जीवन शक्ति चीणा बजाती है वह बडे कोमल स्वर मे

4

गाता दै-+ घने गेम तरु तले 2

संस्कत नाटकों मे चरित्र चित्रण

स्कृत नाय्का की तींसरी विशेषता उच्तक चरित्र-चित्रण की हैं यूनानी नाटकों के प्रतिकूल संस्दत नावकों भें चरित्रों की संख्या अधिक रहा करती थी ओर उनमे सभी वर्गों के चरित्रों का चित्रण भी होता था। रस्क्षत नाख्यशाख्रों ने चरित्रों को कई वर्गा से विभाजित किया है और साथ ही अत्यक दा की मुख्य-सुख्य बातों का समावेश

4६ | [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक नाटक

किया है| प्रसाद जी के नाथकों में यद्यपि नाटक्रीय पात्रों की भग्मार है परन्तु उसे सस्कृत का प्रभाव कहना भूल होंगा। नाटककार की चरित्र निर्माण-शक्ति स्वयं नाटककार की प्रतिभा और कल्पना पर अवलबित रहती हे--वाह्म प्रभावों पर नहीं

सस्कृत नावकों का वातावरण यूनान के नाटकों के वातावरण के समान प्रत्यक्षबादी नहीं रहता | संस्कृत नाठक देवी-देवताश्रों के चरित्रों द्वारा, पौराणिक और ऐतिहासिक कथा संघटन द्वारा ओर अपनी कल्पना शक्ति के सहारे एक देवीय, अलोकिक, आादर्शात्मक वातावरण को निर्मित करते हैँ | यूनानी नाठक भी यद्यपि अतिप्राकृत (30७ ३। 0४/ए074)) शक्तियों को रंगमच पर लावे हैं; परन्तु वे अप्रत्यक्ष रूप से ही, इस संसार के लोगों को खिलोना सात्र समझ कर ही, काम करती हैं | यूनानी नाटक की केथारसिस और भाग्य का व्यंग हमारी वास्त- विक परिस्थिति को ओर भी अधिक विकट बनाने को रहा करती है। प्रताद जी के नाटक इस रूप से भी संस्कृत के नाटकों के अधिक समीप हैं| उनके कथानक, ओर पात्र आदशलोक का ही निर्माण करते हैं ओर यद्यपि उनके नाठको मे देवी-देवताश्रों तथा लोकोत्तर शक्तियों को स्थान नहीं दिया गया है, परन्तु उनके आदर्श चरित्र भगवान्‌ बुद्द, मल्लिका, वासवी, देवकी, देवसेना, आदि अपने दैवीय गुणों में किन देवताओं से कम हैं ! संल्कृत के इस आदर्शलोक मे वास्त- विकता लाने के लिए. नाट्क्राचार्यों ने विभिन्न प्रान्तों की बोलियों का उपयोग करने की आजा ठी है | उनके ब्राह्मण और राजकुमार आदि देववाणी संस्कृत मे बोलते हैं, त्लियाँ प्रात मापा से, और अन्य चरित्र अपने-अपने प्रान्तों की बोली का उपयोग करते हैं | प्रसाद जी ने आन्तीय बोलियों का उपयोग नहीं कराया है, लेकिन वास्तविकता

रखने के लिए भिन्न-मिन्न पात्रों की सापा से चरित्रानुसार काफी अन्तर कर दिया है।

असाद की नाव्य-कला | [१७

संस्कृत नाटकों में काव्य

संस्कृत नावकों से काव्यानुरक्ति अधिक देखने से आती हे, ओर इस दृष्टि से वे एलिजावेथ कालीन नाव्ककारों से बहुत अधिक मिलते हैं | गद्य मे बात करते करते वे पद्म का अनुसरण करने लगते है भिन्न- भिन्न छुम्दों मे सुन्दर कविताएँ नाठककारों ने सजा कर रखी हैं। ये कविताएँ कहीं तो गाने के लिए हैं और कहीं केवल पठन करने के लिए ही प्रसाद जी ने अज्रातशत्रु अधिकतर सस्क्ृत नाथकों का ही अनुसरण किया है। यद्रपि झ्राधुनिक वारतविकता कीओर ध्यान रखते हुए उन्होंने पद्य के इस उपयोग में बहुत परिवर्तन कर दिया है | स्कन्द- शुप्त ओर चन्द्रगुप्त में उन्होंने इस नियम को पाला नहीं। फिर भी भारतीय संस्कृति को वे छोड़ सके | पद्म की शपेक्षा उन्होंने गद्य- काव्य का ही उपयोग अधिक किया है | सस्झृत नाठकों में पद्म का यह उपयोग आदश वातावरण उपस्थित करने के साथ ही साथ रस-सचार करने के लिए भी होता था | प्रसाद जी के ये स्थल भी नाटकों को इस आधुनिक वातावरण से दूर प्राचीन भारत में ले जाते है। वे हमारे सामने नित्यप्रति के जीवन से भिन्न एक नया जीवन उपस्थित कर देते हैँ जिसकी ओर हम सतृष्ण देखा करते है |

पश्चियी ओर संस्कृत नाटक

संसक्षत नावक पूर्ण रूप से (807797080) रोमाटिक नाटक थे | इस कारण वे अंग्रेजी के शेक्सपियर आदि ऐलिजावेथ कालीन नावकों से बहुत अधिक मिलते है। पश्चिमी नाटकों का जो प्रभाव बंगाली या भारतीय भाषाओं पर पड़ा उससे एलिजावेथीय नाठ्को का प्रभाव 'मुख्य है; क्योकि वे सस्कृत नाठकों से कई बातों में पूर्ण रूप से मिल जाते हैं | दिजेन्द्रताल राय के नाटक शेक्सपियर से अधिक प्रभावित हैं, और प्रसाद जी के नावको पर भी यदि पश्चिमी प्रभाव कहीं दिखता है, तो बह भापा ओर वातावरण मे ही, ओर इस रूप में वे पश्चिमी

र्‌

4८ | [ प्रसाद के तीन ऐतिहासिक नादक

आधुनिक नाटकों से दूर शेक्सपियर के नाठकों के समीप ही दिखते है आधुनिक रुचि के फलस्वरूप भी प्रसाद जी ने नाठक रचना से संस्कृत नाव्यशास्त्रो